आम सी बातें #4

आम तो कइ खाए हैं इन सत्ताईस सालों में, लेकिन बचपन की याद पहली बार आई,क्या इतनी उलझ गयी हूँ चीज़ों मेंकी माँ को बस आम ही समज गई? अब जब सोचती हूँ फ़ुर्सत में,बचपन लगता है कोई एक ख़ज़ाना,माँ ही तो है वो तिजोरी जिसने समेटके रखा है,इस आम से रिश्ते का अफसाना…।

आम सी बातें #3

आज माँ की याद आई? रोज़ तो फ़ोन पर बात होती,कभी घर मिलने भी चली जाती,और फिर भी आज माँ की याद आई? शादी के बाद पहली बार आम आए हैं घरमें, आज अपनी मर्ज़ी से आम काट रही हूँ,खुद के लिए भी, ओर घरवालों के लिए भी । नया घर, नए रिश्ते,नयी ज़िंदगी ही समजलो, लेकिन वो आम की खुश्बू,हमेंशा की तरह… आम, ओर वो यादें भी…,आम…। _ _ _ Part #4

आम सी बातें #2

गरमी की छुट्टियों मे,मेरी माँ ज़बरजस्ती आम काटने बिठाती थी मुझे, मैं सोचती,“यह भी कोई काम है?कितना आम है,आम तो खाने होते है, खिलाने थोड़ी ? और मेरी माँ कहती,“जितने प्यारसे आम खिलाओगी, उतने ही तुम्हें भी मीठे लगेंगे, आहा…  क्या स्वाद हुआ करता था जब माँ अपने हाथों से खिलाती थीशायद इसी लिए…? और जैसे ही मेरी पलकें जपकी,हाथ में लिए छुरी, में किचन में थी खडी,एक बूँद आँखो से होती हुई,मेरे गालों से फ़िसलते थाली में जा गिरी । _ _ _ Part #3

आम सी बातें #1

आमहर साल आते हैं,और हर साल कुछ आम सी यादें बुन जाते हैं,  इन यादों को फिर कहीं तिजोरी में बंद करके,हम ज़िंदगी में आगे बढ जाते हैं । कभी स्कूल के इम्तिहान, कोलेज की पढ़ाई,कभी ओफिस का प्रेजंटेशन, या घर की सफ़ाई,  इतने उलझ जातें हम,की वो तिजोरी का रंग – आकार भूल जाते हैं । और फिर कुछ साल बाद॰॰॰फिरसे आती है उस आम की खुश्बू,चुपकेसे, दबे पांव, उस बिन चाबी की तिजोरी को खोलने, उन यादों को दिल से लेकर आखों में भरने । _ _ _ Part #2